वो आज़माते फिरते हैं बार-बार,
और मैं खुद को साबित करते-करते थक जाता हूँ,
उन्हें फर्क नहीं पड़ता किसी के होने ना होने से,
आखिर कैसे_? मैं सोच-सोच के थक जाता हूँ…
वो आज़माते फिरते हैं बार-बार,
और मैं खुद को साबित करते-करते थक जाता हूँ,
उन्हें फर्क नहीं पड़ता किसी के होने ना होने से,
आखिर कैसे_? मैं सोच-सोच के थक जाता हूँ…