दहलीज के दायित्यों की पसोपेज़ में,
कुल की मर्यादाओं का बोझ धर
सारे घर से छुपके- छुपाते,
पतझर की बेला में भी,
ले आई हो तीन बिलपत्रियाँ कहि से,
जिसे शिव ने स्वयं धार रखा है ।।
सच बताओ! क्या मेरे लिए सोमवार रखा है..
मौन धरा मुख, विचलित अंतर्मन
राजमहल में, निर्वासित सा जीवन
किसकी धुन में रमी हुई हो
नयन बिंदु पर प्रतिबिंब कोन है
कि जिसके जप से कंठ सूखाकर
तुमने -प्राण देव को- हलक रखा है
सच बताओ ! क्या मेरे लिए सोमवार रखा है..
क्यों गौरा बनी हुई हो,
काहे जप तप ठान रखा है
निर्जन वन है दुर्गम रस्ता
क्यूँ वैरागी भान रखा है
क्या ह्रदय गर्भ में आज तलक भी
सती का निश्छल प्रेम सांझ रखा
सच बताओ ! क्या मेरे लिए सोमवार रखा है..
@सचिन शर्मा