ये कोई एक दिन नही है
बल्कि
हमारे मुँह पर तमाचा है
कि
तमाम डिग्रीयों के बावज़ूद
आज भी शिक्षा के वज़ूद पर सिर्फ प्रश्रचिन्ह है
हमने एम.फिल-डी.लिट्-पीएचडी इत्यादि
कर जीत लिए मेडल सारे
परन्तु सीखा क्या-
एक दूसरे को नीचा दिखाना,
उठे को गिराना,
गिरे को ज़मीदोज़ कर देना,
बढ़ते को रोक देना,
रूके को नेस्तनाबूत कर देना,
देखो
हमने पढ़ लिए-अध्याय तमाम
पर कभी पढ़ नही पाए-
व्याकुल ह्रदय की पीड़ा
स्त्री का मौनधरा मन
पुरुष की अधीर पराकाष्ठा
जिम्मेदारी तले थकता-हारता बदन
हाँ !!
नही पढ़ पाए कभी-
टूटते सपनों की मुसल्सल तपन
युगल प्रेमियों की दुत्कारी तड़पन
ऊँचे-ऊँचे समाज का निचलापन
इन भरे-भरे शहरों का ख़ालीपन
पूरे-पूरे जीने को तरसता जन-जन
इसीलिये शायद
हम आज भी साक्षरता दिवस मनाते हैं..
@सचिन