माफी

माफी
हाँ मांग लेता है वो,
बात बात पर – शब्द शब्द मे,
शायद खोना नही है उसको,
अपना प्रेम जगत ,
तो स्वीकारता है वो,
अनकिये अपराध,
कुबूल लेता है अपनी सारी गलतियां,
नही चाहता है वो ,
अधूरे संवाद
अपने प्रियसी से,
इसलिए,
हर लेता है वो,
मन की पीड़ा,
चेहरे की थकान,
हा शायद पड़ लेता है वो,
न लिखे गए अर्थ सारे,
औऱ सुन लेता है सब-अनकही बातें,
अधूरे स्वप्न देख अपने प्रियतम के,
फिर
चुनकर बनाता है सृष्टि अपनी,
और,
सोप देता है वो संपूर्ण अपना,
इसलिए ही शायद,
माफी मांग लेता है वो……।

पर जब,
चन्द्रमा के पृष्ठ पर लिखी गई प्रेम की पाती
को,
अस्वीकार कर,
अपना ली जाती है,
अंतर्मुखी चिट्ठियां,
और
स्वयं को सीमित कर ,
परखा जाता है विश्वास,
पर समझा नही जाता मौन,
तब वो ठगा सा,
अगनित बालाएं लेकर, खामोशी से,
सब कुछ छोड़ जाने के पूर्व,
हा अवश्य,
माफी मांग लेता है वो….।

©सचिन

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