लड़के

ये
अंधेरी काली रातों में
सिसकते लड़के
बताओ – कौन सुनेगा इनकी?
पिता
अपना सर्वस्व दे चुके
माँ
बलाएँ लिए जा रही
मित्र
विवश हैं
बन्धु-बान्धव
मूक दर्शक बने हैं
समाज
तमाशे को आतुर है
समय
अभिशापित है
ओर
प्रकृति कूपित
ईश्वर से विमुख
ये अवसादी लड़के
भला – कौन सुनेगा इनकी?


@सचिन शर्मा

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