माना नियति के लेख में हम कभी मिले ही नही
पर तुम अपना मन खराब मत करना
भला धरा से अम्बर की दूरी भी कोई दूरी है
जब अग्नि को साक्षी लेकर
बेमन से
उस अजनबी भाग्यबली के साथ
जीवन की असंख्य यात्राओं में
कदम मिलाते मिलाते थक जाओ
तो दोनों बाहें फैलाकर
आसमां को निहारना
ये मेरे रुदन के आंसू
बादलों में छुपकर
बारिश की बूंदों संग
तुम्हे थामने अवश्य आएंगे..
ओर जब तुम
उस अनमने अधिपति के
नाम का सिंदूर
अपनी मांग में जड़कर
अनवरत निर्जल रहकर
करवा के चाँद को तकोगी
मैं उस अर्ध-चंद से
अपनी उम्र उसे दिलाकर
तुम्हें अभय कर दूँगा..
देखो
अब जाने का समय हो गया
मेरे ये अंतिम शब्द
याद रखना
देह की इस यात्रा में
हम साथ नही लेकिन
रूह की यात्रा
हम सदैव साथ करेंगे
©सचिन शर्मा