मुख मलिन , तन तेजहीन
वो खून से सना हुआ था लथपथ ,
मन्द साज वो दिल का राज़ यूँ कहता चला रे जग में कोई नहीं है शाश्वत ,
सुख- दुखको जान ,
कोरे कागज का मान ,
तू रुक न जाना किसी पथ पर ,
तू बस बढ़ता जा ज़िन्दगी तो हर कदम पे है …
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ
तू दशा न देख ,
तू दिषा न देख ,
तू उस तख़्त की तृषा को देख,
पवन वेग से ले विश्व विजय का रथ ,
तू गज सहस्त्र ,
अब उठा ले शस्त्र ,
निज भुज बल को करके तठस्थ ,
पशुता का वरन ,
मानवता का हरन ,
पल पल में तेरा जीवन मरण,
होना भी है इसी पथ पर .
तू बस बढ़ता जा ज़िन्दगी तो हर कदम पे है ..
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ
तुझी में राम ,
तुझी में साई ,
जल बिलोके पल पल तुझ में अपनी परछाई ,
इसी सोच में हो जा तू लथपथ,
हर तरंग के उमंग की ,
सतरंग के प्रसंग की ,
जन जन के अन्तः रंग की ,
करनी होगी पूरी-तुझको अब शपथ .
यह स्वप्न तू सेज कर ,
तन तेज कर ,
तत्पर हो कर्मठ पथ पर ,
तू बस बढ़ता है ज़िन्दगी तो हर कदम पे है ..
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ
तू हवा का रुख ,
तू फ़िज़ा का सुख ,
तू निज प्रतिबिम्ब से विमुख ,
चंद लहरों की शपथ .
हर तम उजारे को भूलकर ,
तुझे शूल को नित् फूल कर ,
सहजना हे रे कर ले शपथ ,,
जगजीव तू , इस धरा की नींव तू ,
हो प्रचंड भू खंड से उड़कर ,
तू बस बढ़ता जा ज़िन्दगी तो हर कदम पे है
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ
चारु चंद्र की चंचल किरणें ठठुकी रही तुझे पल पल में ,
गोर से निहारता आस्मा तुझको – तुझको अम्बर तल में ,
आन – बान -शान से बखान हो हिन्दोस्ता
बस इतनी सी कर ले दृढ शपथ ,
रात -रानी ,
दिन का राजा ,
निरंतर दिखाते तुझको तेरा पथ ,
चर -अचर- गोचर का तुझको
नमन है शत् शत् ,
तू बस बढ़ता जा ज़िन्दगी तो हर कदम पे है ..
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ
@सचिन शर्मा