परेशां आदमी

ये आदमी इतना परेशान क्यों है
तूफानों की ज़द में मेरा ही मकान क्यों है
जिसे देखो जल्दी है जीत जाने की
यहाँ हर शख़्स इन्तेहाँन में क्यों है
कितने मुखोटे देखूँ सिर्फ एक चेहरे के यहाँ
इतना बदला बदला सा इंसान क्यों है
बच्चियों की आबरू है चीखों में दफ़न
बना आदमी इतना हैवान क्यों है
खौफ़ ही खौफ़ है सदाओं में शामिल
घिरा आसेब से हर मकान क्यों है
में दर्द में पुकारूँ औऱ तू आ भी न सके
ये ज़ालिम ज़माना तेरे मेरे दरमियान क्यों है

©सचिन शर्मा

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